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The Kashmir Files Review: कश्मीरी पंडितों के दर्द को बयां करती है ‘द कश्मीर फाइल्स’,ये फिल्म देखकर शर्तिया रो पड़ेंगे आप

विवेक अग्निहोत्री ने बतौर निर्देशक ‘बुद्धा इन ए ट्रैफिक जैम’ से जो अलग लीक हिंदी सिनमा में पकड़ी है वह दिन पर दिन गाढ़ी ही होती जा रही है। कौन सोच सकता है कि ‘चॉकलेट’ और ‘हेट स्टोरी’ बनाने वाले निर्देशक का ऐसा भी हृदय परिवर्तन हो सकता है लेकिन वह कहावत है ना कि देर आयद दुरुस्त आयद, विवेक का मसला भी कुछ वैसा ही है। विवेक ने अपनी पिछली फिल्म ‘द ताशकंद फाइल्स’ से दुनिया भर के लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचा। फिल्म तीन साल पहले की स्लीपर हिट फिल्म रही। उसी फिल्म का डीएनए विवेक अब अपनी इस नई फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ में लेकर आए हैं। पिछली बार उन्होंने इतिहास की मैली चादर से ढकी पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की हत्या की असलियत को दुनिया के सामने लाने की कोशिश की थी, इस बार उन्होंने कश्मीर की सबसे गंभीर समस्या का नकाब नोंचा है। सामने जो कुछ आता है वह भीतर तक हिला देने वाला है। लोग कह सकते हैं कि फिल्म में तकनीकी कमाल नहीं है, लेकिन इस फिल्म का कमाल इसका सच है। वह सच जिसे कह सकने की हिम्मत कश्मीर से निकले तमाम निर्देशक तक नहीं दिखा पाए।
फिल्म – The Kashmir Files
कास्ट – अनुपम खेर (Anupam Kher), पल्लवी जोशी (Pallavi Joshi), मिथुन चक्रवर्ती (Mithun Chakraborty), दर्शन कुमार (Darshan Kumar), चिन्मय मंडलेकर (Chinmaya Mandlekar), पुनीत इस्सर (Punit Issar), मृणाल कुलकर्णी (Mrunal Kulkarni)

निर्देशक – विवेक अग्निहोत्री
रेटिंग – 3
साल 2019 में विवेक अग्निहोत्री (Vivek Agnihotri) की फिल्म ‘द ताशकंद फाइल्स’ (The Tashkent Files) रिलीज हुई थी और यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर हिट साबित हुई. इस फिल्म को दो नेशनल अवॉर्ड भी मिले थे. ‘द ताशकंद फाइल्स’ के बाद अब विवेक अग्निहोत्री ‘द कश्मीर फाइल्स’ (The Kashmir Files) लेकर आए हैं, जिसमें उन्होंने 90 के दशक में कश्मीर में हुए कश्मीरी पंडितों और हिंदुओं के नरसंहार और पलायन की कहानी को दर्शाया है. इस फिल्म में अनुपम खेर, मिथुन चक्रवर्ती जैसे धुरंधर कलाकार तो हैं ही, लेकिन साथ ही फिल्म में पल्लवी जोशी और दर्शन कुमार जैसे मंझे हुए कलाकार भी नजर आएंगे. ‘द ताशकंद फाइल्स’ को दर्शकों और क्रिटिक्स से काफी सराहना मिली थी, तो अब देखना होगा कि क्या ‘द कश्मीर फाइल्स’ के जरिए विवेक अग्निहोत्री एक बार फिर दर्शकों का दिल जीत पाएंगे या नहीं? अगर आप इस फिल्म को देखने का प्लान बना रहे हैं, तो उससे पहले आप ये रिव्यू पढ़ सकते हैं.
क्या है फिल्म की कहानी?
फिल्म की कहानी कश्मीर के एक टीचर पुष्कर नाथ पंडित (अनुपम खेर) की जिंदगी के इर्द-गिर्द घूमती है. कृष्णा (दर्शन कुमार) दिल्ली से कश्मीर आता है, अपने दादा पुष्कर नाथ पंडित की आखिरी इच्छा पूरी करने के लिए. कृष्णा अपने दादा के जिगरी दोस्त ब्रह्मा दत्त (मिथुन चक्रवर्ती) के यहां ठहरता है. उस दौरान पुष्कर के अन्य दोस्त भी कृष्णा से मिलने आते हैं. इसके बाद फिल्म फ्लैशबैक में जाती है.
फ्लैशबैक में दिखाया जाता है कि 1990 से पहले कश्मीर कैसा था. इसके बाद 90 के दशक में कश्मीरी पंडितों को मिलने वाली धमकियों और जबरन कश्मीर और अपना घर छोड़कर जाने वाली उनकी पीड़ादायक कहानी को दर्शाया जाता है. कृष्णा को नहीं पता होता कि उस दौरान उसका परिवार किस मुश्किल वक्त से गुजरा होता है. इसके बाद 90 के दशक की घटनाएं की परतें उसके सामने खुलती हैं और दर्शाया जाता है कि उस दौरान कश्मीरी पंडित किस पीड़ा से गुजरे थे. पूरी कहानी इसी के इर्द-गिर्द घूमती है.
द कश्मीर फाइल्स एक टाइम ट्रैवल के तौर पर काम करती है, जिसमें 1990 के वक़्त को मौजूदा पीढ़ी के साथ जोड़ने का काम किया गया है.दिल्ली में पढ़ने वाला छात्र अपने दादा की अस्थियों को विसर्जित करने कश्मीर जाता है. यहां पर ही उसकी मुलाक़ात दादा के दोस्तों से होती है और फिर पुरानी कहानियां निकलकर आती हैं कि किस तरह कश्मीरी पंडितों को उनके घर से खदेड़ा गया था. यहां से ही कहानी को रिवाइंड में मोड़ दिया गया है, जिसमें 1990 के वक़्त में किस तरह चीज़ें फैलीं और कश्मीरी पंडितों को भगाया गया, ये दर्शाया गया है. इसी दलदल में दोस्ती, सरकारी मशीनरी के एक पहलू को दिखाते हुए उसपर तंज कसे गए हैं.
रिव्यू
साल 2020 में विधु विनोद चोपड़ा द्वारा ‘शिकारा’ नामक फिल्म का निर्देशन किया गया था. यह फिल्म भी कश्मीरी पंडितों और हिंदुओं के हत्याकांड व पलायन पर आधारित थी. विधु विनोद चोपड़ा ने एक लव स्टोरी के जरिए कश्मीरी लोगों की पीड़ा को दर्शाने की कोशिश की थी, लेकिन विवेक अग्निहोत्री ने ‘द कश्मीर फाइल्स’ के जरिए एक रोंगटे खड़े करने वाली अलग कहानी को दर्शाने की कोशिश की. उन्होंने कश्मीरी हिंदुओं की कहानी को गहरे और बहुत ही कठोर तरीके से इस फिल्म के जरिए सुनाने की कोशिश की है. वह हमें एक पूरी तरह से एक अलग दुनिया में ले जाते हैं. फिल्म में कई ऐसे सीन हैं जो आपके रोंगटे खड़े कर देंगे. फिल्म आपको पूरे समय अपनी सीट से बांधे रखेगी. फिल्म की कहानी अच्छी है और विवेक अग्निहोत्री अपने कार्य में पूरी तरह से सफल नजर आते हैं.
अभिनय
कलाकारों की एक्टिंग ने इस फिल्म को एक नई ऊंचाई पर पहुंचाया है. वैसे तो अनुपम खेर ने कई बार अपने अभिनय से दर्शकों का दिल जीता है, लेकिन इस फिल्म में अनुपम खेर ने पुष्कर नाथ पंडित के किरदार को ऐसे निभाया कि दर्शक आश्चर्यचकित रह जाएंगे. उन्होंने एक बार फिर से ये साबित किया कि वह फिल्म इंडस्ट्री के सबसे शानदार वर्सेटाइल एक्टर हैं. वहीं, मिथुन चक्रवर्ती ने भी अपने किरदार के साथ पूरा न्याय किया है. एक स्टूडेंट लीडर के तौर पर दर्शन कुमार ने बहुत ही प्रभावी अभिनय का प्रदर्शन किया.
क्योंकि कहानी कश्मीर की है, ऐसे में विज़ुअल का जादू दिखाना आसान रहा इसलिए सिनेमेटोग्राफ़ी यहां पर नंबर मार जाती है. फ़िल्म में कुछ हिस्से ऐसे भी हैं, जिसमें उस नरसंहार के दर्द को बिखेरा गया है. फ़िल्म 170 मिनट की है, ऐसे में लंबी कहानी कुछ पल आपको बोर भी करती है और आख़िरी तक खुद को बांधकर रखना एक मुश्किल काम नज़र आता है. लेकिन कहानी को ख़त्म करने की दिलचस्पी आपको रोक सकती है.
फिल्म में कहां रह गई कमी?
फिल्म में जो कमी हमें नजर आई, वो है इसका रनिंग टाइम. यह फिल्म 2 घंटे 50 मिनट की है. इस फिल्म में आसानी से 30 मिनट का कट लगाया जा सकता था. कहीं, कहीं पर फिल्म काफी बोझिल नजर आती है. ऐसा लगता है कि फिल्म के कुछ सीन्स को जबरदस्ती खींचने की कोशिश की गई है. इसके अलावा फिल्म का म्यूजिक भी कुछ खास नहीं लगा है. अगर बैकग्राउंड स्कोर और अच्छा होता, तो फिल्म को ये और भी नई ऊंचाइयों पर ले जा सकता था.
यह फिल्म कमजोर दिल वाले लोगों के लिए नहीं है. अगर आपका दिल मजबूत है तो ही आप इस फिल्म को देखें, क्योंकि फिल्म में कई ऐसे सीन हैं, जिन्हें देखकर आप अपनी आंखें बंद कर सकते हैं. खैर, फिल्म अच्छी है, इसे आपको एक बार जरूर देखना चाहिए.

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